दर्शन और विज्ञान

विज्ञान सत्य

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जानने का अनुशासन है। सत्य को जानना विज्ञान है। विज्ञान ने भौतिक विश्व के अनेक रहस्यों का अनावरण किया है। लेकिन जगत के सभी गोचर प्रपंचो में कार्यकारण श्रंखला की खोज अभी शेष है। शिखर ब्रह्माण्ड विज्ञानी स्टीफेंस हाकिंग ने ”द थ्योरी ऑफ एवरीथिंग” में सभी कार्यो के कारण जानने का कार्य भविष्य की वैज्ञानिक पीढ़ी पर छोड़ा है। सत्य का ज्ञान उपयोगी है। वेद भी सत्य का बोध हैं। लेकिन वेद सत्य जानकर सत्य में होने व रहने की अनुभूति है।

‘वेद’ शब्द का अर्थ भी जानना है। यह संस्कृत की विद् धातु से बना है। विज्ञान और वेद दोनो का मूल जानना है लेकिन जानना पर्याप्त नहीं है, जानने के साथ होने जीने का आनंद बड़ा है। विज्ञान का सम्बंध तथ्यों से है। वेद का सम्बंध सत्य में आनंदित होने से है। दीर्घकाल तक होना, आनंदित होकर रहना ही जीवन है। वेद जीवन अनुभूति हैं। अनुभूति की कविता। जीवन काव्य का मधु। विज्ञान सत्य के निकट है लेकिन जीवन से दूर है। इसलिए काव्य से भी दूर है, बहुत दूर। विज्ञान में प्राण स्पंदन नहीं होते। वेद जीवन से अंतर्संबंध है। सो वेद प्राण स्पंदन की कविता हैं। कविता का जन्म सप्रयास नहीं होता। यह संवेदना अतिरेक का मधु है। अस्तित्व विराट है। वैदिक कवि ऋषि इसे पूर्ण इकाई जानते थे।

वैदिक पूर्ण की प्रवृत्ति का नाम संपूर्णता है। इस संपूर्णता में पृथ्वी, अंतरिक्ष, ज्ञात अज्ञात अनेक सौर मण्डल और सब कुछ सम्मिलित है। मनुष्य जीवन इनसे पृथक नहीं है। जीवन इसी विराट का भाग है। हमारी देह कुछ तत्वों व पदार्थो से बनती है, इसके भीतर चेतन है। देह मृणमय है और चेतन चिन्मय। मृणमय क्षणभंगुर और चिन्मय शाश्वत। मृणमय काया और जगत का ज्ञान प्रयोग आधारित विज्ञान के विषय हैं और चिन्मय का बोध अंतर्यात्रा की अंतिम अनुभूति। दोनो का सहकार जीवन है। वैज्ञानिक निष्कर्ष सर्वमान्य हैं। वे प्रयोग सिद्ध हैं। लेकिन अंतिम नहीं है। विज्ञान के नए प्रयोग भी पुराने निष्कर्षो को काट देते हैं। आध्यात्मिक मेटाफिजिकल निष्कर्ष प्रयोग आधारित नहीं है। इसलिए वे भी सहज स्वीकार्य नहीं हैं। लेकिन अनुभूति भी एक प्रयोगशाला है। जीवन में दोनों की भूमिका है। विज्ञान की और अनुभूति की भी। वेद में दोनो हैं। भारत के राष्ट्रजीवन में वैदिक कथनों का आदर है। क्यों है? इसका उत्तर देना कठिन है। वेदों के बाद अनेक ग्रंथ लिखे गए। महाभारत महाकाव्य है, इतिहास है। आस्तिकों ने इसे पांचवा वेद कहा। चार वेदों में दूसरा, तीसरा या चैथा वेद बताने का साहस नहीं किया गया। भरत मुनि के नाट्य शास्त्र को भी पांचवा वेद कहा गया था लेकिन भरत ने इसे नाट्यवेद कहा। आयुर्विज्ञान मूल्यवान विज्ञान शाखा है। लेकिन इसे विज्ञान कहने में प्रतिष्ठा का भाव कम रहा होगा। इसलिए इस विज्ञान का नाम आयुर्वेद प्रचलित हुआ।

जीवन सत्य है। सुख दुख, शोक, रोग, ईष्र्या, द्वेष, राग, विराग आदि मनोभाव जीवन सत्य का अविभाज्य अंश हैं। काम, क्रोध, प्रीति, प्यार आदि मनोभाव भी जीवन की सच्चाई हैं। मुद, मोद, प्रमोद और उल्लास सबकी इच्छा हैं। लेकिन ऐसे सारे आत्मीय मनोभाव पदार्थ नहीं हैं। इसलिए वैज्ञानिक प्रयोगों की परिधि में नहीं है। विज्ञान का क्षेत्र पदार्थ है। वेदों का क्षेत्र पदार्थ के साथ जीवन की गहन जिजीवीषा भी है। वेद विज्ञान, दर्शन व उललास का काव्य है। इसीलिए वेदों के बाद का परवर्ती दर्शन भी वैदिक दर्शन का अनुवर्ती बना रहा। भारत के दोनों महाकाव्यों रामायण व महाभारत में भी वैदिक अनुभूति व ज्ञान की प्रशंसा है। प्राचीन इतिहास सभ्यता व संस्कृति के अध्ययनकर्ता विद्वान भी भारत की वेद प्रीति पर आश्चर्यचकित हैं। वैदिक ऋषि जिज्ञासा व तर्क के वैज्ञानिक उपकरण छोड़ गए हैं।

अथर्ववेद वेदों के संख्या क्रम में चैथा है। यह साधारणजन का वेद कहा जाता है। इसमें विज्ञान और प्राणवान जीवन व समाज का सार है। इसमें भरापूरा संसार है। यह जीवन का काव्य है। कविता में जीवन का स्पंदन होता है। विज्ञान काव्य नहीं हो सकता। लेकिन जीवन को कभी न कभी किसी अमृत मुहूर्त में काव्य गीत होने का अवसर अवश्य मिलता है। तब जीवन और काव्य पर्याय हो जाते हैं। वैदिक ऋषियों के चित्त में विज्ञान और काव्य साथ साथ है। ऋषि सामान्य कवि नहीं हैं। वे विज्ञान को स्वच्छंद नहीं छोड़ते। वे उसे लोक मंगल के छंद अनुशासन की डोर में बांधे रहते हैं। वे विज्ञान के सत्य को जीवन के सत्य से जोड़ते हैं। अथर्ववेद का धर्म भी दर्शन भी कविता है। अथर्ववेद का विज्ञान संसार में होने, जीने के प्रत्यक्ष यथार्थ का धर्म है। इसमें जीवन के रागद्वैष, ईष्र्या प्रीति साथ-साथ है। वैदिक ऋषि असाधारण कवि हैं। वे साधारण कवियों की तरह बुद्धि के माध्यम से काव्य नहीं रचते। अस्तित्व स्वयं सरल, तरल मंत्र काव्य होकर उनमें उतरता है। ऋक व साम गान उनके पास आते हैं। अस्तित्व मधु संपन्न है। इसी अस्तित्व ने उन्हें मधु दृष्टि संपन्न बनाया है।

अथर्ववेद में जीवन के सत्य हैं। सत्य भी मधु है। अथर्ववेद के रचनाकारों में सर्वत्र मधु दृष्टि है। इसमें सामान्य विषयों के वर्णन में भी ‘मधु’ शब्द की आवृत्ति बार-बार होती है। यहां औषधियों के विवरण में मधु है। जल प्रवाहों में मधु है। सोम के स्वाद में मधु है। वर्षा में मधु है। दूध में मधु है। घर में रहना मधु है, घर से बाहर जाना मधु है। सभा समिति के भाषण में मधु है। वातायन में मधु है। नदी प्रवाहों में मधु है। दर्शन विज्ञान और जीवनशैली में भी मधुमयता है। ऋषियों ने मधुकर की तरह दशों दिशाओं से मधुसंचय किया है। अथर्ववेद जीवन की कविता है। आधुनिक विश्व वेदों से कम परिचित है। इसलिए वेदों के विषय रहस्यपूर्ण माने जाते हैं। वेदों में प्राणवान जीवन है। विज्ञान है, दर्शन है। मनुष्य स्वभाव का सहज स्वीकार है। प्राचीन मनुष्यता का दर्पण है वेद। विश्व सभ्यता का अध्ययन ऋग्वेद के अभाव में असंभव है। ऋग्वेद विश्व मानवता की प्रथम ज्ञान अभिव्यक्ति है। प्राचीन मानव जीवन की समझ के लिए ऋग्वेद का कोई विकल्प नहीं है।

अथर्ववेद भी अनूठा है। जैसे दुनिया की सभ्यताओं, संस्कृति, दर्शन को समझने के लिए ऋग्वेद अपरिहार्य है वैसे ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आयुर्विज्ञान, कालगणना और प्राचीन सांस्कृतिक दार्शनिक इतिहास की समझ के लिए अथर्ववेद की समझ जरूरी है। वेदों के प्रति लोकजीवन में श्रद्धा है। यह अकारण नहीं है। लेकिन इस श्रद्धा के प्रवाह में वेदों को वैज्ञानिक सिद्ध करने के प्रयास भी चलते हैं। वैदिक वचनों को वैज्ञानिक सिद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं। विज्ञान हृदयहीन सत्य खोजी अनुशासन है। विज्ञान की तमाम खोजों को वैदिक दृष्टिकोण से उपयोगी जांचने का काम श्रेयस्कर है। विज्ञान को वैदिक प्रीति व संवेदन देने की आवश्यकता है। भौतिक विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण शिरोधार्य है। यह अंधविश्वास काटता है। वेदों में संवेदनशीलता और जीवन का सार है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण को वैदिक मधुमयता से आपूरित किए जाने की आवश्यकता है।

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